21 October 2005

हाइकू

खुली किताब
अनजानी महक
घर संसार।
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कोमल मन
जिन्दगी की पुस्तक
जड़ा नगीना।
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राख़ मे दबा
विकास का बारूद
एक चिंगारी।
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छोटी चिड़िया
उन्मुक्त गगन में
जीवन आशा।
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तन व्याकुल
मन होता उदास
अकेलापन।
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बारिश हुई
चलो फाके तो टले
चेहरे खिले।
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खेत में पौधे
गाँव घर में लोग
प्रसन्न दिखे।
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नाचे मयूर
बारिश होगी जरूर
सपना यही।
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सोंधी महक
मिटा गई दहक
अच्छी फसल।
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सावन आया
धानी चूनर लिए
साजन आया।
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पहली बूँद
मन मरुस्थल में
दीपक ज्योति।
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काले बादल
किसे आवाज देते
भागे जा रहे।
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किसे ढूँढ़ते
छोड़ कर गया जो
मोती बनने।
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देखो बादल
चटकी टूटी धरा
तुम्हें बुलाती।
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वानी बरसा
नव सृजन होगा
मन हरषा।
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ऊँचे पहाड़
इठलाते बादल
जैसे पागल।
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पागल दिल
छोटे-छोटे कदम
चाहें आकाश।
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चिड़िया बैठी
घर की छत पर
नाता बुनती।
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माँ महकती
मसाले पसीने की
मिश्रित गंध।
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तनी गुलेलें
सर पर शिकारी
जीवन पंछी।
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जीवन मूल्य
संस्कृति की दुनिया
नव सृजन।
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याद माँ की
फूलों से सौ-सौ गुना
आँचल गंध।
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प्यास बुझाती
पेड़ों की, चिड़ियों की,
बहती नदी।
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पुजारी दीप
किरणों के अंकुर
सपने बोता।
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बैठे वानर
अरस्तू मानो बैठा
ढूँढ़े उत्तर।
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-चन्द्रशेखर 'अजनबी'

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